Vat Savitri Vrat 2021: सुहागिन स्त्रियां इस वजह से करती हैं वट सावित्री व्रत, जानिए महत्व, पूजा विधि एवं व्रत कथा

Vat Savitri Vrat 2021: सुहागिन स्त्रियां इस वजह से करती हैं वट सावित्री व्रत, जानिए महत्व, पूजा विधि एवं व्रत कथा

10 Jun, 2021

Vat Savitri Vrat 2021:

हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत सुहागिनों के लिए बहुत ही जरूरी माना जाता है। हिंदू धर्म ग्रंथों केकी मानें तो, वट सावित्री का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती हैं। वहीं, इसके अलावा महिलाएं संतान की प्राप्ति के लिए भी ये व्रत करती हैं। वट सावित्री का व्रत, हर साल ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को आता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को रखने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ती होती है। इस दिन सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं और वृक्ष के चारों ओर घूम कर परिक्रमा भी करती हैं। 

 

वट सावित्री व्रत की कथा-

मद्रदेश में अश्वपति नामक धर्मात्मा राजा का राज था। उनका कोई बच्चा नहीं था। संतान पाने के लिए राजा ने यज्ञ करवाया था। जिसके शुभ लाभ से कुछ समय के बाद उनको एक कन्या हुई, इस कन्या का नाम उन्होंने सावित्री रखा था। फिर जब सावित्री विवाह करने के लायक हुई थी तो उन्होंने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में वरण किया था। 

 

सत्यवान के पिताजी भी एक राजा थे लेकिन उनका राजपाट छिन गया था, जिसकी वजह से वे लोग बहुत ही द्ररिद्रता में जीवन बीता रहे थे। सत्यवान के माता-पिता के आंखों की रोशनी भी चली गई थी। दरअसल सत्यवान जंगल से लकड़ी काटकर लाते थे फिर उन्हें बेचकर जैसे-तैसे अपना घर चलाते थे।

 

उस समय जब सावित्री और सत्यवान के शादी की बातचीत चल रही थी तब नारद मुनि ने सावित्री के पिताश्री राजा अश्वपति को इस बारे में जानकारी दी थी कि सत्यवान अभी अल्पायु हैं और विवाह के एक साल के पश्चात ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। जिसके बाद सावित्री के पिता ने उनको बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सावित्री यह सब जानने के बाद भी अपने निर्णय पर अड़ी रही थी। अंततः फिर सावित्री और सत्यवान दोनों की शादी हुई। शादी के बाद सावित्री अपने सास-ससुर और पति की सेवा में लग गई थी।

 

समय धीरे-धीरे बीतता गया और वो दिन भी आ गया जिस बात का जिक्र नारद मुनि ने किया था। सत्यवान की मृत्यु का समय आ गया था। उस दिन फिर सावित्री भी सत्यवान के साथ वन गई। वन में सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ रहा था कि उसके सिर में असहनीय दर्द होने लगा और इससे पहले की वो कुछ कह पाता वो सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। फिर कुछ समय बाद उनके सामने अनेक दूतों के साथ स्वयं यमराज खड़े थे। इसके बाद यमराज सत्यवान के जीवात्मा को अपने साथ लेकर दक्षिण दिशा की तरफ चलने लगे, पतिव्रता सावित्री भी उनके पीछे-पीछे जाने लगी। 

 

कुछ दूर जाकर यमराज ने सावित्री से कहा कि, 'हे पतिव्रता नारी! जहां तक हो सकता तुमने अपने पति का साथ दे दिया है। अब तुम वापस लौट जाओ' ये सुनकर सावित्री ने कहा कि, 'जहां तक मेरे पति जाएंगे, मुझे भी वहां तक जाना चाहिए। यही सनातन सत्य है' यमराज सावित्री की ऐसी बातें सुनकर प्रसन्न हुए और सावित्री से तीन वर मांगने को कहा। इसपर सावित्री ने कहा, 'मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें' यमराज ने 'तथास्तु' कहकर सावित्री को वापस लौट जाने को कहा और आगे बढ़ने लगे लेकिन फिर सावित्री यम के पीछे चलने लगी। यमराज ने फिर से प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर मांगा, 'मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उनको वापस मिल जाए। 

 

सावित्री ने अपने पति का प्राण ऐसे बचाया 

इतना सब होने के बाद सावित्री ने यमदेव से वर मांगा कहा, 'मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। कृपा कर आप मुझे यह वर दें' सावित्री की ऐसी पति-भक्ति से यमराज प्रसन्न हो जाते हैं और सावित्री को तथास्तु कहते हैं। इसके बाद सावित्री कहती है कि मेरे पति के प्राण तो आप लेकर जा रहे हैं तो आपके पुत्र प्राप्ति का वरदान कैसे पूरा होगा। तब फिर आखिर में यमदेव ने सावित्री को वरदान को देते हुए सत्यवान की जीवात्मा को मुक्त कर दिया। सावित्री फिर उसी वक्त वट वृक्ष के पास लौटी तो उन्होंने पाया कि वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव अब वापस आ गया है। थोड़ी ही देर में सत्यवान उठकर बैठ गया। दूसरी ओर सत्यवान के माता-पिता की आंखें भी ठीक हो गईं और इसके साथ ही उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें वापस मिल गया।

 
 

यह भी पढ़ें

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept
BACK